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पिछले पुरस्कार विजेता

पिछले पुरस्‍कार प्राप्‍तकर्ता



स्वर्गीय घनश्याम बिनानी के जन्मदिवस 3 मई 2000 के अवसर पर घनश्याम बिनानी फाउंडेशन ने 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए वीरता पुरस्कार की घोषणा की थी। इस वर्ग में पिछले एक दशक में हर साल पुरस्कार प्राप्त करने वालों की संक्षिप्त जानकारी दी गई है।

 

वर्ष 2012

 

पॉल फ्रान्सिस

छोटी सी उम्र में अकसर बच्चे ऐसे क़ाबिले-तारी़फ काम कर जाते हैं जो बड़े बड़े नही कर पाते । नन्हे बाज़ीगर पॉल फ्रान्सिस ने ये साबित कर दिया कि साहस की कोई उम्र नही होती । निर्मला माता स्कुल के 9वी कक्ष के विद्यार्थी पॉल ने युकेजी में पढ रहे अपने मासूम भाई सॅम को मौत के मुँह से निकाल लिया । ये बात उस व़क्त की है जब सॅम अपने घर के पास ही सायकल चला रहा था । तभी अचानक उसकी सायकल संतुलन खो बैठी और नन्हा सा सॅम 30 फीट गहरे तालाब में गिर गया । किस्मत से उस वक्त पॉल और उसके साथी वहा से गु़जर रहे थे । सॅम की गुहार सुनने के बावजूद, पॉल के साथियों ने हिम्मत खो दी....लेकिन पॉल ने तुरंत फैसला लिया । पॉल.. जो खुद तैराना तक नही जानते। .. ऐसे वक्त पर पॉल ने अपनी जान की परवाह किये बिना तालाब में छलांग लगा दी । और कुछ ही मिनटों में जॉंबाज़ पॉल ने अपने भाई को डूबने से बचा लिया । वीरता की इस नेक मिसाल ने पॉल को असल जिंदगी का हीरो बना दिया । बहादुरी और जज्बे की जो मिसाल पॉल फ्रान्सिस ने पेश की इस साहस को हम सब का सलाम ...

..बच्चे देश का भविष्य होते हैं ... उनकी अच्छी सोच, निडरता और बहादुरी किसी भी देश के लिए एक बड़े सम्मान की बात है... हमें फक्र है कि ऐसी मिसाले हमारे देश में है.. ऐसी ही एक बहादुरी की मिसाल हैं ... निशि चंद्राकर, निशि के परिवार पर जब जान का संकट आया तो इस नन्हें जांबाज ने जान की परवाह किए, अपनी बहादुरी और सूझबूझ से सबकी जान बचाई ।

 

निशि चंद्राकर

"खूब लड़ी मर्दानी वो ता झॉंसी वाली रानी थी ।" ऐसी कहानियॉं पढ़ कर निशि बड़ी हुई । लेकिन जब असल जिंदगी में बहादुरी दिखाने की बात आई । तो सिर्फ 11 साल की निशि एक कदम भी पीछे नही हटी । 17 मार्च 2012.. वक्त दोपहर 1 बजे ... । निशि का भाई लावेश कमरे में पढ़ाई कर रहा था । इसी बीच वो अपनी किताब उठाने के लिए उठा । जैसे ही उसने अपनी नोट-बुक उठाई.. उसका हाथ पास ही में रखे रूम कुलर में लग गया । लवेश इससे एकदम बिजली के झटके के चपेट में आ गया । उसकी चीख सुनकर निशि, लावेश के कमरे की तरफ दौड़ी । लेकिन इससे पहले की वो कुछ करने की सोचती, उसकी चाची, गोद में अपने छोटे से बच्चे के साथ वहॉं पहुच गई । जल्दबा़जी में उन्होंने लावेशको बचाना चाहा तो गोद में खेल रहे मासूम, हिमेश के साथ खुद भी बिजली के झटके की शिकार हो गई । परिवार वालों की इस हालत देख के साहसी निशि जरा भी न घबराई । ऐसे मौके पर जब, बड़े-बड़े भी हिम्मत खो देते हैं । निशि ने सूझ-बूझ और हिम्मत से काम लिया । निशि ने फौरन एक स्टूल पर चढ़कर, घर का मेन स्वीच बंद कर दिया । इससे बिजली की सप्लाई रुक गई । यही नहीं इसके बाद निशिने प़डिसियों की मदद से लावेश, हिमेश और चाची को अस्पताल भी ले गई । निशि के इस अदम्य साहस और ज़ज्बे ने सबका दिल जीत लिया । निशि चद्रांकर के इस शौर्य और साहस को सलाम ।

 

वर्ष 2011

 

बेबी गंगा परेश बुर्के
उम्र: 10 वर्ष

हर लड़की के लिए उसका पिता ही पहला हीरो होता है, उसका पिता हर स्थिति में उसका साथ देता है और वह जो भी है उसे वैसे ही प्‍यार करता है। बाप-बेटी का रिश्‍ता एक बेहद खास और प्रतिष्ठित रिश्‍ता है। लेकिन आप जिस व्‍यक्ति पर सबसे अधिक भरोसा करते हैं, जो आपकी ताकत है, वही मनुष्‍यता की सारी सीमाएं तोड़ दे और अपने खुद के बच्‍चे का अपहरण करे तो क्‍या होगा। 10 वर्ष की बच्‍ची गंगा की छोटी-सी दुनिया में उस समय भूचाल आ गया जब उसने अपने पिता का क्रूर चेहरा देखा। उस घटना ने उसके पैरों के नीचे की ज़मीन सरका दी।

35 वर्ष के परेश गांधार बुर्के की दो पत्नियां हैं, जिनसे उसे कुल पांच बच्‍चे हैं। दो परिवारों का खर्च चला पाने में अक्षम महसूस करने पर उसने अपनी दो बेटियों गंगा और पवित्रा को ठिकाने लगाने की योजना बनायी। उसने इस काम के लिए पैसा लेकर हत्‍या करने वाले एक बदमाश को सुपारी दी। उस हत्‍यारे ने पवित्रा के पैर बांध दिए और उसे एक बोरे में ठूंस दिया जबकि बेबी गंगा को कुर्सी से बांध कर पीवीसी टेप से उसका मुंह बंद कर दिया। दोनों बच्चियों के लिए यह एक बड़ा सदमा था जिन्‍होंने कभी सोचा तक नहीं होगा कि उन्‍हें जीवन में ऐसा दिन तक देखना पड़ेगा। लाचार गंगा को पड़ोस से प्रार्थना और भजन सुनाई दे रहे थे, तो उसने भी भगवान को याद करना शुरू कर दिया, लेकिन जल्‍दी ही उसे याद आया कि भगवान भी केवल उन्‍हीं की मदद करते हैं जो खुद अपनी मदद करते हैं। बस उसी क्षण, उसने अपने सारे डर पर काबू करके हिम्‍मत जुटाई और वहां से छूटने का प्रयास शुरू कर दिया। काफी मेहनत के बाद, उसने अपने मुंह का टेप निकाल दिया और फिर रस्‍सी भी खोल ली। वह दौड़ कर मंदिर गई, तो वहां उसे अपना कथित पिता दिखा; लेकिन तब तक उसका सामना कड़वी सच्‍चाई से हो चुका था इसलिए वह अपने पिता के पास नहीं गई। इसके बजाय उसने पुलिस के पास जाकर उसे अपने दुर्भाग्‍य और तकलीफ के बारे में बताने का फैसला किया। उसने सारी घटना पुलिस को बतायी और यह भी बताया कि उसकी बहन अब भी कैद है। उसकी सूचना पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने तुरंत उसकी बहन पवित्रा को आजाद करा लिया।

बेबी गंगा ने जो झेला वह एक भयावह अनुभव था। उससे न केवल उसके पिता के प्रति उसकी भावनाएं खत्‍म हो गईं, बल्कि उसके सिर से छत भी छिन गई। आज, वे दोनों अपनी मां के साथ रहती हैं और आज भी शायद उन्‍हें वास्‍तविकता का सामना करने में मुश्किल होती होगी। एक ऐसी स्थिति में जब हरेक चीज से अधिकांश बच्‍चों का विश्‍वास हट जाता; बेबी गंगा ने खुद पर विश्‍वास बनाए रख कर उस प्रतिकूल परिस्थिति का सामना किया। वह केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि अपनी बहन के लिए भी लड़ी।

घनश्‍याम बिनानी बाल वीरता पुरस्‍कार बेबी गंगा की बहादुरी को सलाम करता है।

 

मास्‍टर निखिल सुधीर काबरा
उम्र: 13 वर्ष

माननीय नेल्‍सन मंडेला ने कहा था, '' मैंने जाना कि साहस का मतलब डर ना लगना नहीं है, बल्कि उस डर पर जीत हासिल करना है। बहादुर व्‍यक्ति वह नहीं होता जिसे डर नहीं लगता, बल्कि बहादुर वह होता है जो उस डर को जीत लेता है।'' मास्‍टर निखिल इस बात का साक्षात प्रमाण है कि डर को काबू करना ही साहस होता है। केवल 13 वर्ष की छोटी सी उम्र में, उसे यह समझ आ गया कि डर से भी महत्‍वपूर्ण कुछ था क्‍योंकि उस पर एक जीवन दांव पर लगा हुआ था। महाराष्‍ट्र के जलगांव जिले के इस बहादुर बच्‍चे को अपनी ताकत का पता चला और उसने मौका पड़ने पर बहादुरी दिखाई। उस घटना से निखिल के साहस का पता चलता है।

मास्‍टर निखिल, अप्रैल 2011 की उस भयावह शाम को कभी नहीं भूलेगा। उस शाम, मास्‍टर निखिल को जान बचाने की तेज चीख-पुकार सुनाई दी। यह उसके पड़ोसी श्री विलास हीरालाल पाठक के, जोकि राज्‍य परिवहन निगम के सेवानिवृत्त ड्राइवर हैं, इकलौते बेटे 17 वर्षीय सनी की चीख थी। वह घर में लगी आग में फंस गया था और मदद के लिए चिल्‍ला रहा था। स्थिति की गंभीरता को महसूस करते हुए मास्‍टर निखिल तुरंत सनी को बचाने के लिए दौड़ पड़ा।

सनी आग की चपेट में आ गया था और जिंदगी-मौत की लड़ाई लड़ रहा था, यह देख कर भौचक्‍के निखिल ने उत्‍तेजित हो आसपास पानी की तलाश की। इत्‍तेफ़ाक से, उसे अपने घर के पास बने तालाब में एक प्‍लास्टिक की केन नजर आई। उसे देखते ही वह तालाब में कूद गया ताकि केन उठा सके, लेकिन कूदने के कारण खुद उसके सिर में काफी चोटें आईं। फिर उसने हार नहीं मानी और अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना आग बुझाने के लिए पानी लेने के इरादे से केन उठा ली। पर किस्‍मत उसका साथ नहीं दे रही थी, क्‍योंकि जिस प्‍लास्टिक केन की मदद से वह आग बुझाने की सोच रहा था वह टूटी थी और उसमें ज्‍यादा पानी नहीं आ सकता था। उसने अपना इरादा बदल दिया, और तुरंत अपने घर की रसोई की ओर दौड़ पड़ा ताकि वहां से पानी से भरी बाल्‍टी ला सके। वह पर्याप्‍त पानी लेकर लौटा और सनी पर डाल दिया। साथ ही उसने मदद के लिए अन्‍य लोगों को भी बुला लिया। आखिरकार उसके अकेले के प्रयासों के चलते वह बुरी तरह जल चुके सनी पर लगी आग को बुझा सका। समय पर निखिल के हस्‍तक्षेप से न केवल सनी की जान बच गयी, बल्कि उसे जलने से होने गंभीर चोटों से भी बचाया जा सका।

फिर भी, निखिल और सनी दोनों के लिए इस विपत्ति का अंत नहीं हुआ था। सनी को बचाने के प्रयासों के दौरान अचानक निखिल का ध्‍यान गया कि सनी की रसोई का गैस सिलेंडर अब भी लगा हुआ था, और यदि वह जुड़ा रहता तो मुश्किल खड़ी हो सकती थी। वहां मौजूद लोगों में से कोई भी आगे बढ़ने की हिम्‍मत नहीं जुटा सका, तो निखिल ने एक बार फिर दृढ़ता का परिचय देते हुए गैस सिलेंडर का बटन बंद कर दिया। उसने तुरंत रेगुलेटर निकाल दिया और जलते हुए घर के सभी इलेक्ट्रिक स्विच और उपकरण बंद कर दिए। इस तरह निखिल की बहादुरी ने आपदा को बढ़ने से रोक दिया।

मास्‍टर निखिल की बहादुरी केवल उसकी शारीरिक क्षमता में ही नहीं; बल्कि दबाव की स्थिति में शांत रहने की उसकी क्षमता में भी पता चलती है। उसकी दूरदृष्टि ने केवल एक इंसान की जिंदगी ही नहीं, बल्कि उसके पड़ोस को भी बचाया।

निखिल का यह निस्‍स्‍वार्थ बहादुराना कार्य उसकी बहादुरी, साहस और सूझबूझ को दर्शाता है।

घनश्‍याम बिनानी वीरता पुरस्‍कार इस बच्‍चे की अदम्‍य बहादुरी और मानव जीवन के प्रति लगाव को सलाम करता है।

 

मास्‍टर विजय कुमार सैनी
उम्र: 15 वर्ष

हीरो कौन होता है? लोग कहते हैं कि हीरो वही होता है जो मुश्किल हालात का सामना होने पर वहां से भागने से डरता है...

मास्‍टर विजय कुमार सैनी ऐसा ही एक हीरो है जिसने उस दिन कानपुर के द्वौधी घाट पर बहादुरी का परिचय दिया। 5 सितंबर, 2011 को रोजना की तरह वह घाट पर स्थित अपनी फूल की दुकान में व्‍यस्‍त था। अचानक उसने देखा कि छह विद्यार्थी नदी में छलांग लगाने के लिए तैयार हैं। नदी के तेज बहाव को देखकर उसने उन लड़कों को कहा कि इस समय नदी में कूदना खतरनाक होगा। लेकिन उसकी चेतावनी को अनसुना करके स्‍वभाव से ऊधमी उन छह बच्‍चों ने नदी में छलांग लगा दी।

थोड़ी देर बाद मास्‍टर विजय ने देखा कि एक छात्र नदी की तेज धारा में बहा जा रहा है और डूबने से बचने के लिए जूझ रहा है। पलभर को भी कुछ सोचे बिना मास्‍टर विजय ने अपने भाई के साथ पानी में छलांग लगा दी। उस तेज बहाव में तैरते हुए उसने आशीष, सुनील और रजत को डूबने से बचा लिया। लेकिन अपने तमाम प्रयासों के बावजूद वह तीन अन्‍य छात्रों - शशांक, शिवम और आशुतोष को नहीं बचा पाया। दुर्भाग्‍यवश, वे तीनों नदी की तेज धारा में नहीं टिक सके और डूब गए।

मास्‍टर विजय ने 15 वर्ष उम्र की किशोरावस्‍था में स्‍पष्‍ट बहादुरी का परिचय दिया और मुश्किल घड़े में डटकर खड़ा हुआ। ऐसे लोग विरले ही होते हैं जो अपनी चिंता किए बिना अपनी आत्‍मा की पुकार सुनने का साहस जुटा पाते हैं। मास्‍टर विजय ने इंसानी जिंदगी का मूल्‍य समझा और उन्‍हें बचाने के लिए नदी में कूद गया जबकि उसकी खुद की जान  खतरे में पड़ सकती थी। खुद  से ज्‍यादा औरों की परवाह करने वाले बहादुर लोग परेशानी के आगे घुटने नहीं टेकते और संकट की घड़ी का बहादुरी से सामना करते हैं।

घनश्‍याम बिना वीरता पुरस्‍कार ऐसे हीरो का सम्‍मान करने के लिए प्रतिबद्ध है जो साहस के मामले में औरों से आगे हैं।

 

वर्ष 2010

 

सुश्री अंजली अवधेश गौतम
उम्र: 14 वर्ष

विषम परिस्थितियों में सही कदम उठाने की क्षमता ही वीरता कहलाती है...नन्हीं अंजली के साहस को देखना अद्भुत नज़ारा होगा। अंजली एक बहादुर लड़की की कहानी है।

छत्तीसगढ़ के कुवाकोंडा जिले में नकुलनार गांव पर 7 जुलाई, 2010 की सुबह 800 से 1000 नक्सलियों ने हमला किया था। इनमें से बारह हथियारबंद नक्सलियों के एक समूह ने श्री अवधेश सिंह गौतम के घर पर धावा बोला और आसपास के घरों को जलाने भी लगे।

रास्ते़ में आने वाले हर घर को तहस-नहस करने के बाद हथियारबंद नक्सलियों ने दो लोगों की बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी। इस हंगामे के बीच श्री अवधेश सिंह गौतम की चौदह वर्षीय बेटी अंजली सिंह गौतम को अपना भाई नजर आया, जिसके घुठने में गोली लगी थी और उसका खून बह रहा था। बस अपने भाई की जान बचाने के लिए उसने निडर होकर उसे कंधे पर उठाया और गोलीबारी के बीच तेजी से घर के बाहर की ओर दौड़ पड़ी। इस तरह उसके साहस और सजगता के चलते उसके भाई की जान बच गई। अंजली के इस साहसी कार्य ने तबाही करने निकले नक्सलियों के क्रूर झुंड के इरादों को भी एक तरह से नाकाम कर दिया।

अंजली, सच्चे साहस और वीरता का एक उदाहरण है। घनश्याम बिनानी वीरता पुरस्कार छत्तीसगढ़ की इस नन्ही बहादुर अंजली को सलाम करता है।

 

मास्‍टर विशाल नरेश कुमार
उम्र: 9 वर्ष

एक साहसी और ईमानदार व्‍यक्ति खतरनाक हालात में भी खुद से पहले हमेशा दूसरों की चिंता करता है। मास्‍टर विशाल नरेश कुमार ऐसा ही एक बहादुर बालक है, जो इस कसौटी पर खरा उतरा और तारीफ के काबिल है।

हरियाणा के झज्जर जिले में रहने वाले श्री नरेश कुमार के नौ वर्षीय बेटे मास्टर विशाल ने बालाजी मंदिर से लौटते हुए अपने तीन सहयात्रियों को नया जीवन दिया।

जिस बस में विशाल यात्रा कर रहा था, उसका टायर अचानक फट जाने से उसकी जान खतरे में पड़ गई। इस कारण बस का संतुलन बिगड़ गया और वह सात फीट गहरी खाई में गिरने लगी। उसमें सवार 17 लोगों का जीवन खतरे में था। ऐसे हालात में भी साहस दिखाते हुए विशाल बस के खाई में गिरने से पहले बाहर कूद गया, जिससे उसे गंभीर चोटें आई। खाई में गिर जाने से बस में सवार पांच लोगों की मौत हो गई।

बाकी बचे लोग बुरी तरह से ज़ख़्मी हो चुके थे और उनकी मदद के लिए वहां कोई नहीं था। घायल होने के बावजूद पूरी हिम्मत दिखाते हुए विशाल नजदीकी पुलिस स्टेशन की ओर दौड़ पड़ा और वहां पहुंचकर दुर्घटना से पीड़ि‍त लोगों के लिए सहायता मांगी। वापस आते हुए उसने एक जीप रुकाई और घायलों को अलवर के अस्पताल ले गया। राजगढ़ के एक दूसरे अस्पताल में यह नन्हा बालक चार घंटे तक घायलों के साथ रुका रहा और उनके रिश्तेदारों को स्थिति से अवगत कराता रहा। दुर्घटना में अपनी मां को गंवाने के बावजूद बहादुर विशाल ने संयम बनाए रखा और सभी की मदद करता रहा। नौ वर्ष की नाजुक उम्र में मास्टहर विशाल ने साबित कर दिया कि वीरता उम्र की मोहताज नहीं होती।

घनश्याम बिनानी वीरता पुरस्कार, झज्जर के मास्टर विशाल की वीरता के सम्मान में एक छोटी सी भेंट है।

 

वर्ष 2008 - 2009

 

बेबी जहान्वी
उम्र: 6 वर्ष

कठिन परिस्थितियों में सही राह पर चलने की क्षमता ही शूरता होती है। बेबी जहान्वी जैसी नन्हीं बच्ची का साहस से भरा कार्य बहादुरी की मिसाल है।

कुल छह साल की उम्र की बेबी जाह्नवी ने 15 जुलाई 2009 को अपने छोटे भाई को आग से बचाया था, जिसमें गांव की सात झोपड़ि‍यां जल कर राख हो गईं थी। आंध्रप्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले के पी. गन्नावरम मंडल स्थित पिथानिवरिपलेम गांव की निवासी बेबी जहान्वी, स्थानीय सरकारी प्राथमिक स्कूल की कक्षा दो की छात्रा है। वह एक गरीब परिवार से संबंध रखती है और उसके मां-बाप दिहाड़ी मज़दूर के तौर पर काम करते हैं। घटना के दिन बेबी जहान्वी अपने घर के बाहर खेल रही थी। उसकी मां नहर पर कपड़े धोने गई थी और दस महीने का भाई घर के अंदर गहरी नींद में सोया हुआ था। गाँव में आग लगने का कारण शॉर्ट सर्किट था जिसने पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले लिया था। बेबी ने तेजी से बढ़ते खतरे को भांप लिया और अपनी जान की परवाह किए बगैर घर में घुस गई। उसे मकान से बाहर निकालकर उसने अपने भाई की जान बचाई। स्थानीय नेता और पड़ोसी ऐसी खतरनाक स्थिति में बेबी जहान्वी की दिलेरी पर अब भी हैरानी जताते हैं।

घनश्याम बिनानी वीरता पुरस्का्र आंध्रप्रदेश के गन्नावरम मंडल की इस नन्ही बहादुर बेबी जहान्वी को सलाम करता है।

 

मास्‍टर गौरव सिंह सैनी
उम्र: 13 वर्ष

GBCBAबहादुर वही होता है जो खतरनाक स्थिति का सामना करते हुए भी खुद से पहले दूसरों की चिंता करता है। मास्टर गौरव सिंह सैनी ऐसा ही एक बहादुर लड़का है, जिसकी खूब सराहना होनी चाहिए।

केवल तेरह वर्ष के मास्टर गौरव सिंह सैनी ने 3 अगस्त 2008 को हिमाचल प्रदेश के नैना देवी मंदिर में हुई भगदड़ के दौरान तकरीबन 60 लोगों की जान बचाई थी। गौरव वहां अपने परिवार के साथ गए थे। बारिश से बचने के लिए बनाया गया छज्जा गिरने को लोगों ने भूस्खलन समझ लिया। इससे भक्तों में भ्रम की स्थिति बन जाने से अराजकता फैल गई। भीड़ नियंत्रित करने के लिए बनाई गई पुलिस की रेलिंग को लोगों ने धकेलना शुरू कर दिया, जो बाद में गिर गई और परिणामस्वरूप भगदड़ मच गई। इस उलझन के बीच टोहना जिले में आठवीं कक्षा के छात्र मास्टर गौरव सिंह सैनी ने कंटीले तारों को कसकर पकड़ लिया, जिससे 60 लोग गिरने और कुचलने से बच गए। मास्टर गौरव को उस समय अचानक अपने भीतर ताकत की लहर महसूस हुई और वह खुद भी हैरान था कि वह इतने लोगों के दबाव को कैसे झेल पाया। ऐसे नाजुक मौके पर उसकी सूझबूझ की वजह से कई लाचार महिलाओं और बच्चों की जान बच सकी। कंटीले तार से घायल और बेहद दर्द के बावजूद मास्टर सैनी ने अपनी जान जोखिम में डालते हुए उसे पकड़े रखा और इतने सारे लोगों की जान बचाई।

घनश्याम बिनानी वीरता पुरस्कार, हरियाणा के मास्टर गौरव सिंह सैनी के शानदार साहस के सम्मान में एक छोटी सी भेंट है।

 

वर्ष 2007 - 2008

 

मास्‍टर अनिल
उम्र: 12 वर्ष 6 महीने

अपनी प्रतिबद्धता पर अटल रहते हुए आतंक के अनजान भय का सामना करने के लिए साहस की दरकार होती है।

13 सितंबर 2008 को राजधानी दिल्ली सीरियल बम धमाकों से दहल उठी थी। अनिल उस समय कनॉट प्लेस (राजीव चौक) के नजदीक बाराखंभा रोड के चौराहे पर गुब्बारे बेच रहा था, जब उसने कुर्ता-पजामा पहने दो दाढ़ी वाले आदमियों को ऑटो से उतरते देखा। उन दोनों ने काली पॉलीथीन में कोई चीज़ एक कूड़ेदान में रखी और वहां से चले गए। इसके पंद्रह मिनट बाद वहाँ बम धमाका हुआ। सीरियल धमाकों के चश्मदीद गवाहों में से एक के तौर पर अनिल ने उन दोनों संदिग्धों के बारे में महत्वपूर्ण सुराग दिए। इससे पुलिस को उन दोनों आतंकवादियों के स्केच बनाने में मदद मिली। जान का खतरा होने के बावजूद अनिल ने मीडिया और पुलिस के सामने बयान दिया कि वह उन दोनों आतंकियों को पहचान सकता है।

अपना घर सलाम बालक ट्रस्ट से जुड़े अनाथ अनिल ने आतंकवादियों के बारे में महत्वपूर्ण सुराग देने में असाधारण साहस का परिचय दिया। हम इस बहादुर युवक को सलाम करते हैं।

घोषणा: पहचान छिपाने के लिए नाम बदला गया है

 

 

मास्‍टर विशाल सूर्याजी पाटिल
उम्र: 11 वर्ष 9 महीने

साहसी लोग ही कुछ कर गुजरने में कामयाब होते हैं। लेकिन इतनी कम उम्र में साहस दिखाना वाकई में सराहनीय है।

श्रीमती अंजना बलवंत पाटील और उनका बारह वर्षीय बेटा विशाल बलवंत पाटील 28 अप्रैल 2008 की दोपहर में कपड़े धोने के लिए चिकोतरा नदी पर गए हुए थे। विशाल नदी के किनारे खेल रहा था कि अचानक उसका पैर फिसला और वह 22 फीट गहरे पानी में गिर गया। बाहर निकलने की कोशिश में वह मदद के लिए चिल्लाया। विशाल तैरना नहीं जानता था, इसलिए उसे बचाने के लिए उसकी मां अंजना पाटील नदी में कूद गईं। लेकिन वह भी तैरना नहीं जानती थीं, इस कारण वह डूबने लगीं। यह देख नदी किनारे मौजूद अन्य महिलाएं चिल्लाने लगीं। तैराकी करके घर लौट रहा विशाल सूर्याजी पाटिल उनकी चीख-पुकार सुनकर वहां पहुंचा। स्थिति खराब होते देख उसने तुरंत गहरे पानी में छलांग लगा दी और डूबते हुए बच्चे को पकड़ कर उसे किनारे ले आया। फिर, दोबारा नदी में छलांग लगाई और श्रीमती पाटील की भी जान बचाई। तब तक मां और बेटा दोनों ही बेहोश हो चुके थे। विशाल ने उनका प्राथमिक उपचार भी किया।

ज़ुल्पेवाड़ी, कोल्हापुर के विशाल सूर्याजी पाटील ने दो जिंदगियां बचाने के लिए असाधारण साहस का परिचय दिया। हम इस बहादुर युवा को सलाम करते हैं।

 

बेबी प्राची संतोष सेन
उम्र: 9 वर्ष 8 महीने

बातों से ज्यादा असर काम में होता है। और साहसी कार्य सिर्फ कहते ही नहीं, हमें निस्वार्थ और मानवीयता के बहुमूल्य पाठ भी पढ़ाते हैं।

प्राची सेन, उसका चार वर्ष का भाई मानस और तेरह साल की बहन रिचा 2 जुलाई 2007 को पड़ोसी की छत पर खेल रहे थे। उनके साथ उनके दोस्त चार वर्षीय अनय पवार और ग्यारह वर्षीय शैफाली पवार भी थी। छत से लगभग तीन फीट की दूरी से 11 केवी की हाई टेंशन बिजली की तार गई थी। अनय पवार ने पास में पड़ी एक सात फीट लम्बी लोहे की छड़ को उठाया और खेल-खेल में उसे घुमाने लगा। अचानक लोहे की छड़ पर से उसकी पकड़ ढीली पड़ गई और वह हाई टेंशन बिजली की तार से छू गई। छड़ लोहे की होने के कारण अनय बिजली के करेंट की चपेट में आ गया। पास ही खड़ा मानस सेन भी अजय से चिपक गया। उनकी मदद के लिए दौड़ी रिचा और शैफाली भी करेंट की चपेट में आ गईं। उन चारों की ऐसी हालत देख थोड़ी दूर पर खड़ी प्राची तुरंत उनकी मदद के लिए दौड़ी। बच्चों के नजदीक न जाने की सावधानी बरतते हुए उसने बिजली के तार से चिपटी लोहे की छड़ को बाएं हाथ से कस कर पकड़ा और दाएं हाथ से बच्चों को दूर धकेलते हुए छड़ को झटके से खींच कर अलग कर दिया। परिणाम स्वरूप, चारों बच्चे करेंट से छूट गए और छत पर गिर पड़े। उन चारों को मामूली चोटें आई, लेकिन प्राची का बायां हाथ बुरी तरह जल चूका था, इस वजह से उसकी उंगलियां काटनी पड़ी।

खरगांव, मध्य प्रदेश की प्राची ने अपनी जान को खतरे में डालते हुए चार बच्चों की जान बचाकर उल्लेखनीय साहस का परिचय दिया है। हम इस बहादुर बच्ची को सलाम करते हैं।

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वर्ष 2006 - 2007

 

मास्‍टर गगन जे. मूर्ति और बेबी भूमिका जे. मूर्ति

GBCBAगगन जे. मूर्ति और भूमिका जे. मूर्ति, ज्ञान मूर्ति और मीनाक्षी की जुड़वा संतानें हैं। 7 वर्ष की उम्र के दोनों बच्चे, जे.पी. नगर, बंगलोर स्थित कैपिटल पब्लिक स्कू़ल में पढ़ते हैं।

श्री मूर्ति 6 अक्तूबर 2007 को अपनी साप्ताहिक दिनचर्या के तहत फल और सब्जियां खरीदने के लिए माडीवाला सब्जी मंडी जाने के लिए तैयार हुए। गगन और भूमिका भी उनके साथ जाना चाहते थे । पत्नी के कहने पर उन्होंने बच्चों को भी साथ ले लिया।

सभी बाजारों की तरह माडीवाला भी बहुत भीड़-भाड़ वाला बाजार है। फल-सब्जी खरीदने आने वालों के अलावा यहां यात्री अलग-अलग जगह जाने के लिए वैन, बस और निजी वाहन पकड़ने भी आते हैं।

श्री मूर्ति ने अपना वाहन सुरक्षित स्थान पर पार्क किया और बच्चों को इधर-उधर ना जाने की सलाह दी। बच्चों को मूंगफली और बिस्कुट देकर वह सब्जी खरीदने चले गए।

बाजार में आवारा पशु भी भारी संख्या में थे। तभी दो बैल खाने के एक टुकड़े को लेकर आपस में लड़ पड़े। पहले लोगों को उन्हें लड़ते देख मजा आया। लेकिन जल्द ही बैलों की लड़ाई हिंसक हो गई, क्योंकि दोनों बैलों ने एक-दूसरे को लहूलुहान कर दिया था। इसके बाद वे लोगों पर टूट पड़े। दोनों बैल एक फुटपाथ पर आ गए, जहां बैठ कर डेढ़ साल की एक छोटी बच्ची कुछ खा रही थी। लोगों ने पत्थर फेंक कर बैलों को डराने की कोशिश की, पर किसी ने भी बच्ची को बचाने की कोशिश नहीं की।

अचानक भूमिका ने चिल्लाकर गगन से बच्ची को बचाने के लिए कहा। पलक झपकते ही वह बच्ची गगन की गोद में थी। इस बीच, गगन का फिसला और वह बच्ची के साथ फर्श पर लुढ़क गया। इन जुड़वा बच्चों ने एक बच्चे की जान बचा कर अनुकरणीय साहस का प्रदर्शन किया है।

 

बेबी रज़ि‍या परवीन उमरखान

महाराष्ट्र में 5 से 8 अगस्त, 2006 के बीच हुई भारी बारिश में अनेक नदी और नाले उफान पर थे। बुलढाना जिले में स्थित खामगांव तहसील के मथनी गांव में बोर्दी नदी पुल से 4 फीट ऊपर बह रही थी, जिसकी वजह से दो दिन तक गांव का संपर्क खामगांव तहसील से कट गया था। मथनी से खामगांव से चार किमी दूर है।

बारिश थमने के बाद भी बाढ़ का पानी पुल तक पहुंच रहा था। गांव में हर किसी को यह अच्छा लग रहा था, क्योंकि पिछले कई वर्षों से नदी में बिल्कुल भी पानी नहीं था।

जिला परिषद का उर्दू माध्यमिक विद्यालय नदी के किनारे पर बना है। 10 अगस्त 2006 को लंच के समय बच्चे पुल पर बाढ़ का पानी देखने गए। गांव के अन्य बच्चे भी वहां इकट्ठा हो गए थे। अचानक, 3 वर्ष का वहीदखान नादरखान नदी में गिर गया। जिला परिषद उर्दू स्कूल में पढ़ने वाली बारह वर्षीय रज़ि‍या परवीन उमरखान ने नदी में छलांग लगा दी और वहीदखान को बचा लिया, जबकि रज़ि‍या तैरना नहीं जानती थी। उसका साहस और तुरंत फैसला करने की क्षमता सराहनीय है।

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वर्ष 2005 - 2006

 

मास्‍टर पार्थ एस. सुतारिया

उस दिन लगातार बारिश के कारण शाम सात बजे के आसपास पानी का स्तर कुछ ही मिनटों में जमीन से पांच फीट ऊपर पहुंच गया था। बिजली गुल हो गई और वाहन पानी में डूब गए। बाढ़ के पानी के तेज बहाव में कुछ सामान और जानवर भी बह रहे थे। पार्थ अपनी मां और दादा-दादी के साथ घर पर था। उसके पिता बांद्रा स्थित अपने कार्यालय में फंस गए थे और अगले दिन ही घर पहुंच सके।

पंद्रह वर्षीय पार्थ सुतारिया ने ग्राउंड फ्लोर (सी/3/6/1, ओ.एन.जी.सी. कॉलोनी) से एक परिवार को मदद के लिए पुकारते सुना। परिवार के बच्चे रो रहे थे और पानी के दबाव के कारण दरवाजा खोलने में असमर्थ माता-पिता को समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या करें। 5’3’’ लंबा पार्थ तुरंत नीचे आ गया और देखा कि पानी का स्तर बहुत तेजी से बढ़ रहा है। तैराक होने के बाद भी पहले तो वह डर-सा गया। उसने चिल्ला कर श्री भगत से कहा कि वे धक्का देकर दरवाजा खोलें। श्री भगत को पार्थ की आवाज सुनकर खुशी हुई कि किसी ने उनकी मदद की गुहार का जवाब दिया। लेकिन वह तमाम कोशिशों के बावजूद दरवाजा नहीं खोल सके।

तब पार्थ अपनी जान जोखिम में डालकर गले तक आ चुके पानी में धीरे-धीरे दरवाजे तक पहुंचा। उसने सबसे पहले जाली वाले दरवाजे को खोलने का प्रयास किया, जो अंदर से बंद था। दरवाजा न खोल पाने पर उसने जाली को तोड़ दिया और अंदर हाथ डालकर कुंडी खोली। उसके बाद उसने श्री भगत से दरवाजे को अंदर से खींचने के लिए कहा और खुद बाहर से धक्का देने लगा। लेकिन पानी के दबाव के कारण वे दोनों मिलकर भी दरवाजा नहीं खोल पा रहे थे। अब फ्लैट के अंदर पानी का स्तर साढ़े चार फीट तक पहुंच चुका था। उनका एक पड़ोसी लकड़ी का लट्ठा ले आया और पार्थ से मुख्य दरवाजे को तोड़ने के लिए कहा। आखिरकार, उसकी लगातार मेहनत के बाद दरवाजे में एक छेद बन गया, जिससे परिवार के सभी लोगों को एक-एक करके सुरक्षित बाहर निकालने में मदद मिली। अगले दस मिनट में पानी का स्तर दस से बारह फीट पहुंच गया था। इमारत की पहली मंजिल पूरी तरह पानी में डूबी गई थी। यदि पार्थ ने समय पर कदम नहीं उठाया होता, तो चार लोगों के उस परिवार को बचा पाना असंभव हो जाता।

जब यह किशोर अपनी जान जोखिम में डालकर एक परिवार को बचाने का प्रयास कर रहा था, तब बाकी वयस्क निवासी केवल मूक दर्शक बने हुए थे। यह सब कुछ बीस से तीस मिनट के बीच हुआ। इस दौरान पार्थ ने न केवल शारीरिक रूप से प्रयास किए बल्कि परिवार का मनोबल भी बनाए रखा।

 

बेबी आसमा ए. खान

चिल्ड्रन ऐड सोसायटी, मानखुर्द की बारह वर्षीय अनाथ बच्ची आसमा खान ने बाढ़ के दौरान अकेले ही 40 बच्चों की जान बचाई।

कक्षा सात की छात्रा आसमा पिछले दो वर्षों से अनाथालय में रह रही है और वहां के बच्चों के बीच लोकप्रिय है। उस दिन भारी बारिश के कारण बच्चों को 4 बजे ही छुट्टी दे दी गई थी। शाम को लगभग 4:30 बजे, बच्चों के शयनकक्षों में पानी घुसने लगा और उन्हें निरीक्षक के कमरे में शिफ्ट करना पड़ा था। उस कमरे में तीन से आठ वर्ष की उम्र के लगभग 100 बच्चें थे। उन्हें लगा कि वे सुरक्षित हैं, लेकिन पानी का स्तर बढ़ने लगा।

निरीक्षक और स्टाफ के अन्य दो व्यक्ति विचार कर ही रहे थे कि बच्चों को कैसे सुरक्षित बाहर निकाला जाए कि उनकी आंखों में डर देख कर आसमा ने तुरंत पानी में छलांग लगा दी और बच्चों को दूसरी इमारत में ले गई। उसने अपनी जान की परवाह नहीं की, जबकि वह तैरना नहीं जानती थी। उसने तीन बच्चों को अपने कंधो पर उठा लिया और उन्हें दूसरी तरफ पहुंचाया। उसने करीब 40 बच्चों को बचाया और बाकी बच्चों की मदद स्टाफ के बाकी लोगों ने की।

बहादुर आसमा एक सलाह भी देती है। उसका कहना है कि बारिश ने मुझे सिखाया कि हमें प्रकृति से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। वह कहती है कि किसी को भी पेड़ काटकर और पर्यावरण को नष्ट् करके प्रकृति में असंतुलन पैदा नहीं करना चाहिए।

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वर्ष 2004 - 2005

 

बेबी अक्‍सा एलिज़ाबेथ मणि

जहां सबसे बहादुर भी झिझक जाते हैं वहां बच्चे बहादुरी दिखाते हैं।

शनिवार 27 नवंबर, 2004 को आठ वर्षीय अक्सा अपनी छह वर्षीय छोटी बहन अनोहा और उसकी चार वर्षीय दोस्त अनुग्रहा के साथ खेल रही थी। वे रोज की तरह अपने घर के सामने बने मैदान में खेल रहे थे। अक्सा का घर कोट्टायम-कोची मेन रोड पर साइक्लोन जंक्शन से शुरू होने वाली सड़क पर बना है और उसके घर से सड़क पहाड़ की ओर चढ़ना शुरू होती है।

खेलते-खेलते अनुग्रहा सड़क पर चली गई और उस समय एक जीप पहाड़ की ओर से तेज गति में नीचे आ रही थी। बेबी अक्सा अपनी जान की परवाह किए बिना ऊपर की ओर दौड़ पड़ी और ऐन समय पर अनुग्रहा को पीछे की तरफ खींच लिया। हालांकि, जीप के ड्राइवर ने ब्रेक लगा दिए थे, फिर भी जीप अनुग्रहा से महज़ कुछ गज की दूरी पर थी। अक्सा की बहादुरी की वजह से अनुग्रहा की जान बच गई।

 

मास्‍टर जेन्‍सन टी. संतोष

आठ वर्षीय मास्टर जेन्सन टी. संतोष 5 मई, 2004 को ‘कक्कथ कयम’ नदी में नहाने गया था। यहाँ इलाके के लोग तैरना सीखते हैं। वास्तव में, नदी कई जगह बहुत गहरी है। जेन्सन के साथ उसका पांच वर्ष की बहन मॉन्सी, पड़ोस के छह बच्चे और कुछ बड़े भी थे।

सभी बच्चे कम गहरे पानी में तैर रहे थे कि अचानक मॉन्सी गहरे पानी में चली गई। इससे पहले की कोई कुछ समझ पाता, वह पानी के अंदर की दो चट्टानों के बीच फंस गई और सिर के बल पलट गई।

सभी मदद के लिए चिल्लाने लगे। लेकिन बहुत अच्छा तैरना नहीं जानते हुए भी जेन्सन ने मॉन्सी को बचाने के लिए नदी में छलांग लगा दी। बहुत मुश्किल से यह नन्हा हीरो मॉन्सी तक पहुंच पाया और उसे सुरक्षित बाहर निकाल लाया। इस दौरान दोनों को गंभीर चोटें आईं।

जेन्सन की सजगता और वीरता वाकई में अनुकरणीय है। इतनी कम उम्र का होते हुए भी उसने दिखा दिया कि सच्ची निडरता क्या होती है। अगर वह नहीं होता, तो मॉन्सी का जीवन गंभीर खतरे में पड़ गया था।

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वर्ष 2003 - 2004

 

बेबी शाइनी टी.ए.

GBCBAतेरह वर्षीय शाइनी केरल के एक छोटे से गांव में रहती है। वह एक खेत मजदूर के परिवार से हैं, जो गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करता है। वह केरल के देवी विलासम हायर सेकंडरी स्कूल की कक्षा आठ में पढ़ती हैं।

शाइनी अपनी मां और पड़ोस की लीला के साथ 12 सितंबर, 2003 को जंगल से लकड़ी चुनने गई थी। जब वे जलाने की लकड़ि‍यां बिन रहे थे, तभी अचानक झाड़ि‍यों के पीछे से एक जंगली हाथी निकल आया और उन पर हमला करने के लिए आगे बढ़ने लगा । ये सभी लोग डरकर भागने लगे। बदकिस्मती से अधिक उम्र के कारण लीला तेज नहीं दौड़ पाई और हाथी ने उसे बर्बरता से कुचल कर मार डाला। लीला को मारने के बाद हाथी शाइनी की मां की ओर बढ़ा, जो दौड़ते समय गिर गई थी और हाथी ने उसके पैर कुचल दिए।

मां की चीख सुनकर शाइनी तुरंत पलटकर उसे बचाने पहुंच गई। उसे लगा कि हाथी ने उसकी मां को भी मार दिया है, उसने तेज आवाज में मदद के लिए चीखना शुरू कर दिया और उस जगह से नहीं हटी। उसी चीख सुनकर हाथी का ध्यान उसकी ओर गया और वह उस पर हमला करने बढ़ा। लेकिन जितनी देर में वह शाइनी पर हमला करने के लिए पलटा, उतनी देर में शाइनी अपनी गंभीर रूप से घायल मां को खींचकर सुरक्षित स्थान पर ले जाने में कामयाब हो गई। इस बीच गांववाले वहां पहुंच गए और हाथी को खदेड़कर भगा दिया। बिना झिझके तुरंत प्रतिक्रिया देने के कारण शाईनी अपनी मां की जान बच सकी। इस साहसी कार्य के लिए उसे निश्चित तौर पर नायिका का दर्जा दिया जाना चाहिए।

 

मास्‍टर योगेश कुमार जांगीड़

राजस्थान के छोटे गांव जांगीड़नगर के योगेश कुमार जांगीड़ ने 15 मई, 2003 को बहादुरी का प्रदर्शन किया, जिसके लिए उसकी सराहना होनी चाहिए।

पांचवी कक्षा का योगेश उस तपती दोपहर को स्कूल से घर लौट रहा था। पास ही चंद्रनगर में एक घर से उसने धुआं उठते देखा। उत्सुकता में वह उस घर के पास पहुंचा। वहां उसने देखा कि फूस की छत से धुआं उठ रहा है और घर के पीछे की तरफ बनी खिड़की को पीटने और चीखने की आवाज़ें आ रही थीं। घर के अंदर आग की लपटें दिख रही थीं और एक छोटी बच्ची आग से घिरी थी। वह आग की लपटों की चपेट में आने वाली थी। उसका परिवार पास के शहर में काम पर गया हुआ था और उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनकी इकलौती बेटी जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है। कमरे की छत भी आग की चपेट में आ चुकी थी और बच्ची डर से चिल्ला रही थी। साहस और बहादुरी का परिचय देते हुए ग्यारह वर्षीय योगेश दौड़ कर वहां पहुंच गया। वह आग की लपटों के बीच से रास्ता बनाते हुए दरवाजे से घर में दाखिल हुआ। उसने बच्ची का हाथ पकड़ कर उसे बड़ी मुश्किल से बाहर निकाला।

जानलेवा ख़तरे के बावजूद योगेश ने अनुकरणीय साहस और अगुवाई का परिचय दिया। उसकी सजगता और शूरता के कारण उस नन्हीं लड़की की जान बच गई।

 

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वर्ष 2002 - 2003

 

बेबी मेघना इंडल्कर
– सतारा (बालिका श्रेणी)

अपनी रक्षा करने की प्रवृत्ति ईश्वर से मिलती है। यहां तक कि पशुओं में भी यह पाई जाती है। लेकिन महाराष्ट्र में सतारा की ग्यारह वर्षीय मेघना ने इसकी कोई परवाह नहीं की और अपनी जान की बाजी लगाकर छह वर्षीय बच्‍चे की जान बचाई।

मेघना सतारा के एक गांव के रूढि़वादी परिवार से ताल्लुक रखती है। परिवार की परंपरा के रूप में इस गांव की लड़कियों को बचपन से ही तैरना सिखाया जाता है, क्योंकि वहां आए दिन सुनने को मिलता है कि फलां लड़की को उसके निर्दयी सास-ससुर ने कुएं में ढकेल दिया।

14 मार्च 2003 को मेघना शाम को लगभग पांच बजे स्कू्ल से लौट रही थी। उसने देखा 10-12 छोटे-छोटे बच्चे मदद के लिए पुकार रहे हैं। दरअसल छह वर्षीय गणेश कुएं में गिर गया था। मेघना ने देखा कि वह जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है। आमतौर पर उसकी उम्र का कोई बच्चा घबराकर मदद के लिए चीख-पुखार मचाने लगता। लेकिन अपने जीवन के बारे में एक पल को भी सोचे बगैर मेघना फौरन कुएं में कूद पड़ी। यह कुआं कमोबेश 35 फुट गहरा था। छोटी मेघना ने गणेश को पीछे से पकड़ा। फिर सीढि़यों के ज़रिये ऊपर चढ़ आई। छोटे बच्चे को उसके मां-बाप को सौंप दिया गया। उन्होंने बेबी मेघना को दिल से दुआएं दीं।

छोटी सी मेघना ने गंभीर खतरे के आगे अनुकरणीय साहस और तेज़ दिमाग का परिचय दिया। उसकी फ़ौरन प्रतिक्रिया ने एक बच्चे की जान बचा ली।

 

मास्‍टर राहुल भौमिक
– शिलांग (विशेष श्रेणी)

सामान्य परिस्थितियों में बारह वर्षीय राहुल को स्कूल जाने वाला एक उत्साही बच्चा होना चाहिए था, लेकिन नियति ने उसके साथ कुछ अजीब खेल खेला।

शिलांग के रहने वाले राहुल ने आठ वर्ष की कम उम्र में अपने मां-बाप गंवा दिए थे। कमलेश और श्रीमती कविता जोशी उसे अपने कुत्तों की देखभाल के लिए मुंबई ले लाए। उसे हर महीना एक हजार रुपये का वेतन देने का वादा किया गया था, जो उसे कभी नहीं मिला। कड़ी मेहनत के बाद भी उसकी जब-तब पिटाई की जाती थी। उसे दंपति के कांदिवली वाले मकान में रखा गया था, जबकि वे खुद अंधेरी में रहते थे। उससे गुलामों की तरह से बर्ताव किया जाता था।

एक दूसरी लड़की अनीता को भी ये लोग नौकरानी के बहाने मुंबई लाए थे। जब राहुल को इस दंपति के अंधेरी वाले घर में ले जाया गया, तो उसकी मुलाकात शिलांग की रहने वाली छोटी उम्र की अनीता से हुई। जब दोनों में जान-पहचान हो गई, तो अनीता ने राहुल को अपनी व्यथा-कथा सुनाई और बताया कि ये दंपत्ति उससे वेश्या व्यवसाय कराते हैं। 4 दिसंबर 2004 को जब दंपति सो रहे थे, तब दोनों छोटे बच्चे वहां से भाग निकले। उन्हें चार भयानक दिन फुटपाथ पर भिखारियों के साथ गुज़ारने पड़े।

मुंबई के अंधेरी रेलवे स्टेशन पर पुलिस वालों की पूछताछ के दौरान बहादुर राहुल ने दंपति के साथ अपने अनुभवों की विस्तार से जानकारी दी। वह पुलिस को दंपति के अंधेरी और कांदिवली के मकानों पर भी ले गया, जहां से पुलिस ने नौ रजिस्टर बरामद किए, जिसमें 107 नाबालिग लड़कियों के नाम थे और एक नए रैकेट का पर्दाफाश हुआ।

राहुल की बहादुरी ने न केवल उसकी जिंदगी बदली, बल्कि अनीता समेत सौ से अधिक लड़कियों के जीवन को भी बचाने में कामयाब हुआ। वह असाधारण साहस, बहादुरी और अच्छे मानव-मूल्यों के प्रतीक के रूप में उभरकर सामने आया। राहुल ने इस कहावत को सच कर दिखाया कि ईश्वर उन्हीं की मदद करता है, जो अपनी मदद करना जानते हैं।

 

मास्‍टर कैरोल फ्रांसिस
– केरल (बालक श्रेणी)

सोलह वर्षीय कैरोल फ्रांसिस के लिए 26 दिसंबर, 2003 का दिन सामान्य होना चाहिए था। उप्पुथरा, कोच्चि के सेंट फिलोमिना हाई स्कूल के बारहवीं कक्षा के विद्यार्थी कैरोल को अपनी पढ़ाई के अलावा आसपास की चीजों से बेपरवाह होना चाहिए था।

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। संतोष नामक एक होटल चलाने वाले 51 वर्षीय सिवादसन पिल्लई सुबह साढ़े दस बजे पेरियार नदी पर स्नान करने गए। यह सामान्य दिनचर्या उस वक़्त एक भयानक सपने में तब्दील हो गई, जब उनका पैर बालू के कीचड़ में धंस गया और वे डूबने लगे। मदद के लिए उनकी चीख-पुखार ने भीड़ का ध्यान अपनी ओर खींचा और वे भी मदद के लिए चिल्लाने लगे। पर किसी ने भी पिल्लई को बचाने का साहस नहीं दिखाया। यह 16 वर्षीय मास्टर कैरोल फ्रांसिस ही था, जो वहां एक फ़रिश्ते की तरह प्रकट हुआ। मदद की उनकी गुहार को सुनकर कैरोल ने जान जोखिम में डालते हुए अपनी उम्र से तिगुने बड़े व्यक्ति को बचाने के लिए नदी में छलांग लगा दी।

युवा कैरोल ने सहायता के लिए चिल्लाने की बजाय नदी में कूदना बेहतर समझा। उसने अपनी समझदारी से पिल्लई को बालों से पकड़ा और उन्हें सुरक्षित किनारे पर ले आया।

कैरोल ने इस बात का शानदार उदाहरण पेश किया कि बहादुरी के कारनामे करने के लिए उम्र की बाधा नहीं होती। उसने अपने जीवन को खतरे में डालकर किसी दूसरे व्यक्ति को नया जीवन दिया।

 

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वर्ष 2001 - 2002

 

मास्टर आर्चीज़ लिमये
– मुंबई (बालक श्रेणी)

युवा आर्चीज़ के लिए 26 मई 2001 का दिन मौज-मस्ती से भरा सामान्य दिन होना चाहिए था। पर कुदरत ने उसके लिए कुछ और ही लिख रखा था।

उसका दिन हमेशा की तरह ही शुरू हुआ, आर्चीज़ के पिता मनोहर एस लिमये सुबह पौने आठ बजे काम के लिए घर से निकल पड़े, जबकि उसकी मां मानसी लिमये साढ़े दस बजे निकलीं। आर्चीज़ के स्कूल में छुट्टी थी और वह टीवी पर डिस्कवरी चैनल देख रहा था। तभी दरवाजे की घंटी बजी जिसने उसके जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। उसे इस बात का ज़रा भी अंदाजा नहीं था कि अगले कुछ मिनट उसके साहस, सजगता और सहनशक्ति की परीक्षा के होंगे। आकर्षक पहनावे में झोले के साथ दरवाज़े के बाहर खड़े एक युवक ने ''जी टीवी प्रतिनिधि'' का पहचानपत्र दिखाया। आर्चीज़ ने सौजन्यता दिखाते हुए उसकी सभी चीजों को देखा लेकिन कुछ भी खरीदने से इन्कार कर दिया।

सेल्समैन ने बड़ी मासूमियत से उससे एक गिलास पानी मांगा, लेकिन जब वह पानी लेकर लौटा तो उसने आर्चीज़ के सिर पर हथौड़े से हमला कर दिया। फिर पलक झपकते ही उसने आर्चीज़ की गर्दन पकड़ी और रूपये व अलमारी की चाबियों की मांग करने लगा। आर्चीज़ गंभीर रूप से जख्मी हो चुका था और बेहोश न होने की कोशिश कर रहा था। पंद्रह वर्षीय किशोर आर्चीज़ की जूडो कराटे की ट्रेनिंग काम आई और उसने हमलावर के संवेदनशील अंग पर लात जमा दी। इससे क्रोधित उस व्यक्ति ने आर्चीज़ पर फिर से हथौड़े से हमला करना चाहा, पर उसका लकड़ी का हैंडल निकलने से हथौड़ा दूर गिर गया। बहादुर आर्चीज़ ने समझदारी दिखाते हुए लकड़ी के हैंडल को अपने कब्जे में लिया और हमलावर पर दो-तीन वार कर दिए। डकैत ने अब भी हार नहीं मानी थी। आर्चीज़ को खत्म करने के प्रयास में उसने उसे गले से पकड़ा और उसके सिर को दीवार से लड़ाने की कोशिश की। शोरगुल सुनकर पड़ोसी दरवाजे पर आ गए। उन्होंने मदद बुलाई और उसे लेकर अस्पताल की ओर भागे। आर्चीज़ के सिर पर हथौड़े से सात बार हमला किया गया था। उसके मस्तक पर फ्रैक्चर हो गया था और सिर पर 18 टांके लगे थे। किशोर आर्चीज़ ने गंभीर खतरे से हार नहीं मानी और अनुकरणीय साहस का प्रदर्शन किया। अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की परवाह किए बिना उसने पैदाइशी शक्ति और निडरता का परिचय दिया।

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वर्ष 2000 - 2001

 

मास्‍टर कैवान पंथकी
– मुंबई (बालक श्रेणी)

GBCBAयह दस वर्षीय कैवान के लिए दिल दहला देने वाली घटना थी। 21 सितंबर 2000 से पहले उसके लिए चोर और लुटेरे केवल कहानी की किताबों, टीवी सीरियलों या फिल्मों में हुआ करते थे।

वह मुंबई स्थित धोबी तलाव इलाके में चौथी मंज़िल के अपने फ्लैट में खेल रहा था। रात के करीब सवा दस बजे थे तभी उसने देखा कि छह इंच का चाकू लिए कोई उसके फ्लैट में घुसने की कोशिश कर रहा है। चीखने और शोर मचाने की बजाय और गुंडों की ओर हमले के भय के बिना उसने खुद ही बहादुरी दिखाई । वह दरवाजे की ओर भागा और अपनी पूरी ताकत से धक्का लगाकर लुटेरे को दरवाजे और दीवार के बीच फंसा दिया। फंसे होने पर भी लुटेरे ने अपना चाकू कैवान की जांघ पर चला दिया, लेकिन इस छोटे बच्चे ने अपनी जगह नहीं छोड़ी। आती मुसीबत को भांपकर लुटेरा आखिरकार वापस भाग गया। इस पूरे घटनाक्रम में छोटा कैवान समस्या से जूझने में इस कदर खो गया था कि उसने मदद के लिए किसी को आवाज़ भी नहीं लगाई। हालांकि उसके मां-बाप और दादा-दादी फ्लैट के भीतर ही थे। सेंधमार के भाग जाने के बाद ही उसने मदद की गुहार लगाई । घटना के बारे में पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई गई और कैवान का अस्पताल में उपचार कराया गया। यह बिल्कुल असाधारण बात है कि कैवान जैसा एक छोटा बच्चा हथियारबंद डाकू को रोके और इस क्रम में अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की परवाह न करते हुए अपने में निहित साहस और निडरता का परिचय दे।

 

बेबी चांदुबा सोधा
– गुजरात (महिला श्रेणी)

GBCBAचांदुबा की कहानी उस छोटी सी बच्ची की कहानी है जिसने अपने पिता और चचेरी बहन की ज़िन्दगी बचाई और एक बैंक को लुटने से भी रोका। छोटी सी चांदुबा गुजरात के गांधीधाम में को-आपरेटिव बैंक के परिसर में बने घर में अपने परिवार के साथ रहती थी। उसके पिता सरदार सिंह बैंक में वाचमैन के रूप में काम करते थे। यह 30 जून 1999 की बात है, आधी रात को चार हथियारबंद लुटेरे इमारत में बैंक को लूटने के लिए दाखिल हुए। उस समय सरदार सिंह ड्यूटी पर था। उसका भतीजा धिरुबा भी उसके साथ था। चाबियां मांगे जाने पर सरदार सिंह ने सकारात्मक जवाब नहीं दिया, तो लुटेरों ने उसके साथ बदसलूकी की। पहले उसके हाथों को बांधा, फिर उसे घसीटकर शौचालय में ले गए और वहीं बंद कर दिया। बाद में जब वह चिल्लाने लगा और खिड़की की छड़ों को तोड़ने की कोशिश की, तो लुटेरों ने सरदार सिंह पर गोली चलाई। गोलियों के नहीं लगने पर उन्होंने उस पर लोहे की छड़ों से हमला किया और उसे घायल कर दिया। शोरगुल सुनकर जाग जाने और अपने पिता व चचेरे भाई को लोगों की गिरफ्त में देखकर छोटी चांदुबा डरने की बजाय बाहर की तरफ भागी और मदद के लिए चिल्लाने लगी।

शोर शराबा सुनकर लुटेरों ने भागने में ही भलाई समझी और बाद में पुलिस ने उन्हें पकड़ भी लिया। चांदुबा की चीख सुनकर पड़ोसी भी बैंक की ओर भागे। सिर पर लगी चोट के कारण सरदार सिंह का बहुत खून बह गया था, उसे फ़ौरन आवश्यक चिकित्सकीय सहायता प्रदान की गई।

ग्यारह वर्षीय चांदुबा ने अनुकरणीय साहस व होशियारी का परिचय देते हुए दो लोगों की जान बचाई और खुद की जान की भी परवाह नहीं की। इसके अलावा उसने बैंक को भी लुटने से बचाया। वह हम सभी के लिए एक उदाहरण है।

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